प्रेम अटल (29/10/2018) -EK ANKAHI PREM KATHA

 


 

एक अनछुई अबोध सी।

मेरी कल्पना की शोध सी।।

 

आई उन्मुक्त ऐसी अविलाषी। 

मेरे उद्विग्न मन में प्रज्वलोत सी।।

 

असंख्य अविचलित कठिन प्रण,

जब छिण हुआ उद्वेग से।

प्रेम पनपा यु जैसे,

धरा उमड़ी विछोभ से।।

 

बात बात में बात हुई

यु बातो की लगी होड़ जैसे।

आठ पहर चौसठ घडी हो

कड़ी कड़ी से ओतप्रोत जैसे।।

 

यही साल गुजरते रहे

मदमस्त मानव पिघलते रहे।

कैसे जीवन कटता रहा

समझ क्या प्रीत कहते इसे।।

 

हर नूतन प्रभा के लाली में

तेरी पूजा की सिमा करबद्ध करूँ।

जिंदगी तुझमे पूरी हो

हर जन्म हो तुझसे आबद्ध करूँ।

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